खंडवा। कुछ दिन पहले रेलवे ट्रैक पर गूँजे किसानों के आंदोलन के बाद, शनिवार को वही टिगरिया क्षेत्र एक बार फिर आक्रोश और दर्द का बड़ा केंद्र बन गया।
इस बार प्रदर्शन का स्वरूप इतना भावुक और तीखा था कि महिलाएँ भी अर्थी के सामने बैठकर विलाप करती दिखीं, और किसानों ने खंडवा सांसद ज्ञानेश्वर पाटिल का पुतला फूँककर अपना गुस्सा जाहिर किया।
📌 महिलाओं ने कहा— “हमसे झूठ बोला गया, अब हालात बर्दाश्त नहीं”
प्रदर्शन में शामिल महिलाओं ने मिट्टी के कंडों पर हांडी चढ़ाकर वही दृश्य बनाया, जैसा किसी मृत्यु के समय होता है। कई महिलाएँ अर्थी के पास बैठकर रोने लगीं और कहा—
“नेता लोग सिर्फ आश्वासन देते हैं… लेकिन हमारी जिंदगी दिन-ब-दिन संकट में डूब रही है। प्याज के दाम आसमान पर हैं, हमारी फसलें बर्बाद हो रही हैं, और किसान कर्ज में डूब रहा है।”

इस तरह का भावनात्मक विरोध क्षेत्र में पहली बार देखा गया।
📌 किसानों ने सांसद पाटिल की प्रतीकात्मक ‘अर्थी’ निकाली, पुतला भी फूँका
तीन दिन के वादे को पूरा न किए जाने पर किसानों का गुस्सा फूट पड़ा।
उनका कहना है कि सांसद ने दिल्ली में मुलाकात और समाधान का भरोसा दिया था, लेकिन समय निकल गया और कोई ठोस कदम नहीं उठा।
गुस्साए किसानों ने:
- सांसद ज्ञानेश्वर पाटिल का पुतला जलाया
- प्रतीकात्मक अर्थी निकाली
- अर्थी पर फूल चढ़ाए
- और वहीं बैठकर रो-रोकर अपना दर्द जाहिर किया
यह दृश्य पूरे इलाके में चर्चा का विषय बना रहा।
📌 किसानों का आरोप — “हमारा धैर्य खत्म हो रहा, सरकार सुन ही नहीं रही”
किसानों का कहना है—
“हम रोज़ घाटे में जा रहे हैं। मुख्यमंत्री-सांसद सिर्फ बयान दे रहे हैं, काम कुछ नहीं हो रहा। दिल्ली में बात कराने का वादा किया था, लेकिन तीन दिन बीत गए—कोई हल नहीं निकला।”
किसानों ने चेतावनी दी है कि अगर समाधान नहीं निकला तो आंदोलन और उग्र रूप ले सकता है।

📌 सांसद का जवाब — “मैं किसान पुत्र हूँ, समाधान के लिए प्रयासरत हूँ”
सांसद ज्ञानेश्वर पाटिल ने कहा—
“मैं खुद किसान पुत्र हूँ, किसानों का दर्द समझता हूँ। जैसे ही केंद्र से समय मिलता है, किसानों को मुलाकात करवाऊँगा।”
हालाँकि प्रदर्शनकारियों का कहना है कि यह केवल रूटीन बयान है, जबकि जमीन पर स्थिति जस की तस है।
📌 क्षेत्र में भारी पुलिस बल तैनात
टिगरिया क्षेत्र को पुलिस छावनी में बदल दिया गया है।
प्रशासन स्थिति पर नज़र बनाए हुए है और किसी भी अनहोनी को रोकने के लिए सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है।
आज के पूरे आंदोलन में महिलाओं की आवाज सबसे बुलंद रही, जिन्होंने अपने विलाप और आंसुओं के साथ इस विरोध को एक भावनात्मक शक्ल दे दी।
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