Mughal Empire History: भारतीय इतिहास के पन्नों में कई ऐसे तथ्य छिपे हैं, जो आज के दौर में लोगों को हैरान कर सकते हैं। ऐसा ही एक दिलचस्प पहलू है मुगल काल में गौ-हत्या (Cow Slaughter) पर प्रतिबंध का इतिहास। अक्सर मुगलों को लेकर कई तरह की बातें की जाती हैं, लेकिन ऐतिहासिक दस्तावेज गवाही देते हैं कि अधिकांश मुगल बादशाहों के शासनकाल में हिंदू भावनाओं का सम्मान करते हुए गौ-हत्या पर पूरी तरह रोक लगाई गई थी।
आइए जानते हैं कि भारत के पहले मुगल बादशाह बाबर से लेकर अंतिम शासक बहादुर शाह जफर तक, गाय को लेकर क्या नीतियां थीं।

बाबर ने हुमायूं को मरते वक्त दी थी यह वसीयत
इतिहास के दस्तावेजों में इस बात का साफ उल्लेख मिलता है कि भारत में मुगल साम्राज्य की नींव रखने वाले प्रथम बादशाह बाबर ने अपने बेटे हुमायूं को अपनी मृत्यु के समय एक खास वसीयत (गुप्त वसीयतनामा) सौंपी थी।
बाबर ने वसीयत में लिखा था: “ऐ मेरे प्यारे बेटे! इस मुल्क के लोगों को यदि अपना बनाना हो और तुम्हें उनका दिल जीतना हो, तो गौ-हत्या पर पूरी तरह रोक लगाना। धार्मिक कट्टरता से दूर रहकर ही इस देश पर दिल से राज किया जा सकता है।”
‘आईने-अकबरी’ में भी दर्ज है अकबर का प्रतिबंध
महान मुगल सम्राट अकबर ने भी अपने दादा बाबर की इसी नीति को आगे बढ़ाया। अबुल फजल द्वारा रचित प्रसिद्ध ऐतिहासिक ग्रंथ ‘आईने-अकबरी’ में इस बात का साफ जिक्र मिलता है कि अकबर ने बहुसंख्यक हिंदू समाज की धार्मिक भावनाओं का गहरा सम्मान किया था। अकबर ने अपने पूरे साम्राज्य में गौ-हत्या पर सख्त प्रतिबंध लगा दिया था, और ऐसा करने वालों के लिए कड़े दंड का प्रावधान था।
जाने-माने विदेशी यात्री बर्नियर ने भी अपने भारत यात्रा विवरण (Travelogues) में इस बात की पुष्टि की है कि अकबर के बाद जहांगीर के शासनकाल में भी देश में गौ-हत्या पर पूरी तरह रोक जारी रही।

बहादुर शाह जफर का ऐतिहासिक फरमान: “गौ-हत्यारे को मिलेगी मौत की सजा”
1857 की क्रांति के नायक और अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर ने तो गौ-संरक्षण को लेकर बेहद कड़ा रुख अख्तियार किया था। 28 जुलाई 1857 को बकरीद के त्योहार के मौके पर उन्होंने एक शाही फरमान जारी किया था।
इस फरमान के तहत उन्होंने साफ आदेश दिया था कि त्योहार के मौके पर कोई भी गाय की कुर्बानी नहीं देगा। यही नहीं, जफर ने खुलेआम यह ऐलान भी करवा दिया था कि जो भी व्यक्ति गौ-हत्या का दोषी पाया जाएगा, उसे मौत की सजा दी जाएगी।
दक्षिण से लेकर अवध के नवाबों तक ने दिखाई थी उदारता
गौ-संरक्षण की यह नीति केवल दिल्ली या आगरा के मुगल दरबार तक ही सीमित नहीं थी। इतिहास गवाह है कि:
- दक्षिण भारत में: सुल्तान हैदर अली और उनके बेटे टीपू सुल्तान के शासनकाल में भी गौ-हत्या को कानूनन अपराध माना गया था।
- अवध के नवाब: अवध के अंतिम नवाब वाजिद अली शाह के समय भी प्रजा की धार्मिक आस्था का सम्मान करते हुए गायों को काटने पर पूरी तरह प्रतिबंध लागू था।
यदि कुछ अपवादों और कुछ कट्टर शासकों के दौर को छोड़ दिया जाए, तो भारत के मध्यकालीन इतिहास और अधिकांश मुगल काल में सामाजिक सद्भाव और सत्ता को सुचारू रूप से चलाने के लिए गौ-हत्या पर पूरी तरह पाबंदी रही थी।